फासला

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meenu yatin

1 Jan 20261 min read

Published in poetrylatest

दिसम्बर और जनवरी सा
रिश्ता  रहा है हम में
करीब लगता है बहुत मगर
बरस भर का फासला है।

कितनी भी मुहब्बत से भरा हो दिल
जुबान तक न आएगा
गहराइयों में दबा रहा बरसों, और
दिल से जुबान तक बड़ा फासला है।

न उम्मीद किसी से
न नाराज़गी  ही किसी से
फर्क है  ये समझ का बस
हमारी सोच में ही  बड़ा फासला है ।

~मीनू यातिन

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meenu yatin

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दिसम्बर और जनवरी सा
रिश्ता  रहा है हम में
करीब लगता है बहुत मगर
बरस भर का फासला है।

कितनी भी मुहब्बत से भरा हो दिल
जुबान तक न आएगा
गहराइयों में दबा रहा बरसों, और
दिल से जुबान तक बड़ा फासला है।

न उम्मीद किसी से
न नाराज़गी  ही किसी से
फर्क है  ये समझ का बस
हमारी सोच में ही  बड़ा फासला है ।

~मीनू यातिन

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