शून्य

शून्य

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meenu yatin

1 Jan 20261 min read

Published in poetrylatest

एक ऐसा समय जब
मनुष्य शून्य में चला जाता है।
कितना कुछ होता है पर
वो बोल नहीं पाता है।
बंद पलकें कभी, हल्के से खुलती हैं
देखती हैं सबको, डबडबाती हैं
आंखो के कोर से एक आंसू टपक जाता है।

दर्द से भरी हल्की मुस्कान एक कभी
होठों पर तैर जाती है ।
एक एक सांस भारी –भारी सी
कितनी कीमती होती जाती है।

जब घुटन सी होती है
वो सांस ले नहीं पाता है।
विचार आते आते
अपनी गति धीमी कर लेते हैं ।

एक एक सारे विचार,
सारे रिश्ते अपने कहीं खोने लगते हैं।
बस एक शून्य में मन उतरता चला जाता है।
इंसान अकेला ही आता है
और चुपचाप अकेले ही चला जाता है।

रह जाते है धरे के धरे सारे रिश्ते नाते
अपने  और अपनों की बातें
सुबह से  शाम तक जिम्मेदारी और उलझने
पुराने सारे  साजो सामान और पुरानी यादें।

एक –एक चीज जो याद दिलाती है
उन अच्छे बुरे समय की ,लम्हों की ।
वक्त बीतने के साथ धुंधलाती  यादें
भरते जख्म और अधूरी सी जिंदगी।

पर जो जगहें खाली हो जाती हैं
उन्हें कोई भर नहीं पाता है।
इंसान अकेला तो आता है पर
लोगों  का बहुत कुछ ले जाता है।
एक शून्य जीवन में भर कर वो
यादों की सौगात दे जाता है।

~मीनू यातिन

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एक ऐसा समय जब
मनुष्य शून्य में चला जाता है।
कितना कुछ होता है पर
वो बोल नहीं पाता है।
बंद पलकें कभी, हल्के से खुलती हैं
देखती हैं सबको, डबडबाती हैं
आंखो के कोर से एक आंसू टपक जाता है।

दर्द से भरी हल्की मुस्कान एक कभी
होठों पर तैर जाती है ।
एक एक सांस भारी –भारी सी
कितनी कीमती होती जाती है।

जब घुटन सी होती है
वो सांस ले नहीं पाता है।
विचार आते आते
अपनी गति धीमी कर लेते हैं ।

एक एक सारे विचार,
सारे रिश्ते अपने कहीं खोने लगते हैं।
बस एक शून्य में मन उतरता चला जाता है।
इंसान अकेला ही आता है
और चुपचाप अकेले ही चला जाता है।

रह जाते है धरे के धरे सारे रिश्ते नाते
अपने  और अपनों की बातें
सुबह से  शाम तक जिम्मेदारी और उलझने
पुराने सारे  साजो सामान और पुरानी यादें।

एक –एक चीज जो याद दिलाती है
उन अच्छे बुरे समय की ,लम्हों की ।
वक्त बीतने के साथ धुंधलाती  यादें
भरते जख्म और अधूरी सी जिंदगी।

पर जो जगहें खाली हो जाती हैं
उन्हें कोई भर नहीं पाता है।
इंसान अकेला तो आता है पर
लोगों  का बहुत कुछ ले जाता है।
एक शून्य जीवन में भर कर वो
यादों की सौगात दे जाता है।

~मीनू यातिन

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