दिया हूँ कब से जल रहा हूँ

दिया हूँ कब से जल रहा हूँ

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ashish kumar tripathi

28 Dec 20252 min read

Published in poetrylatestlife

दिया हूँ कब से जल रहा हूँ, मुझे हवाओं का डर नहीं है।
भरे हैं काँटे रास्तों पर हरे से छालों का ग़म नहीं है।।

है खयालों में अब भी लेकिन, जो स्वप्न पूरे हुए नहीं है।
मैं आस फिर भी लगा रहा हूँ, मुझे नाकामियों का गम नहीं है।।

जो दोस्तों से मिली है नफ़रत, वो दुश्मनों से कहां मिलेगी।
मैं छाँव से भी छला हुआ हूं, तो आग का अब डर नहीं है।।

तुझी से उम्मीद लगा रहा हूॅ, है इल्म़ ज़ोखिम उठा रहा हूँ।
अजीब सी एक कशमकश है, तुझी से लूटा जा रहा हूं।।

अनवरत चला जा रहा हूँ, मँज़िलों का पता नहीं है।
है जोश अब भी जवाँ दिलों का, ये पाँव अब भी थका नहीं है।।

समेट रखा है जाने कब से, ये खारा पानी बहा नहीं है।
कहाँ खबर है किसी को अब तक, कि मोम पत्थर बनी हुई है।।

जो ज़ुबान अब तक कह ना पाई, वो दास्ताँ अब उतार रही है।।
जो कलम भी मेरी लिख ना पाई, वो आँख से अब बयान हुई है।।

जो कश्ती मेरी डुबोई तुमने, वो टूट कर के बिखर गई थी।
अना मेरी भी कम नहीं थी, हर एक टुकड़े से निखर रही थी।।

दिया हूँ कब से जल रहा हूँ, मुझे हवाओं का डर नहीं है।
भरे हैं काँटे रास्तों पर हरे से छालों का ग़म नहीं है।।

रचयिता - आशीष कुमार त्रिपाठी "अलबेला"

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दिया हूँ कब से जल रहा हूँ, मुझे हवाओं का डर नहीं है।
भरे हैं काँटे रास्तों पर हरे से छालों का ग़म नहीं है।।

है खयालों में अब भी लेकिन, जो स्वप्न पूरे हुए नहीं है।
मैं आस फिर भी लगा रहा हूँ, मुझे नाकामियों का गम नहीं है।।

जो दोस्तों से मिली है नफ़रत, वो दुश्मनों से कहां मिलेगी।
मैं छाँव से भी छला हुआ हूं, तो आग का अब डर नहीं है।।

तुझी से उम्मीद लगा रहा हूॅ, है इल्म़ ज़ोखिम उठा रहा हूँ।
अजीब सी एक कशमकश है, तुझी से लूटा जा रहा हूं।।

अनवरत चला जा रहा हूँ, मँज़िलों का पता नहीं है।
है जोश अब भी जवाँ दिलों का, ये पाँव अब भी थका नहीं है।।

समेट रखा है जाने कब से, ये खारा पानी बहा नहीं है।
कहाँ खबर है किसी को अब तक, कि मोम पत्थर बनी हुई है।।

जो ज़ुबान अब तक कह ना पाई, वो दास्ताँ अब उतार रही है।।
जो कलम भी मेरी लिख ना पाई, वो आँख से अब बयान हुई है।।

जो कश्ती मेरी डुबोई तुमने, वो टूट कर के बिखर गई थी।
अना मेरी भी कम नहीं थी, हर एक टुकड़े से निखर रही थी।।

दिया हूँ कब से जल रहा हूँ, मुझे हवाओं का डर नहीं है।
भरे हैं काँटे रास्तों पर हरे से छालों का ग़म नहीं है।।

रचयिता - आशीष कुमार त्रिपाठी "अलबेला"

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