औलाद (एक मुकम्मल अहसास)

औलाद (एक मुकम्मल अहसास)

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SWATI SAHU

24 Sept 2026•1 min read

Published in poetrylatest

मन्नतों के धागे से शुरू हुआ एक सिलसिला,
ईश्वर के वरदान से जो अनमोल तोहफा मिला।

पहली बार जब वो दो लकीरों में मुस्कुराया,
धड़कनों ने ज़िंदगी का एक नया राग गाया।

ख्वाबों के रेशम से जिसे हर पल बुना है,
हमने अपनी दुआओं में बस उसी को चुना है।

वह हमारा ही अक्स, हमारा ही वजूद है,
जिसके होने से घर में जन्नत का सुजूद है।

निस्वार्थ प्रेम और त्याग का वो पावन प्रतीक है,
औलाद ही तो इस दुनिया में सबसे अनमोल और सटीक है।

श्रेष्ठ जिंदगी का एक मुकम्मल अहसास है,
शब्दों और सीमाओं से परे जिसका स्वरूप बेहद विशाल है।

औलाद ही तो इस जीवन का एक मुकम्मल अहसास है,
औलाद ही तो इस जीवन का एक मुकम्मल अहसास है।

स्वाति साहू

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SWATI SAHU

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मन्नतों के धागे से शुरू हुआ एक सिलसिला,
ईश्वर के वरदान से जो अनमोल तोहफा मिला।

पहली बार जब वो दो लकीरों में मुस्कुराया,
धड़कनों ने ज़िंदगी का एक नया राग गाया।

ख्वाबों के रेशम से जिसे हर पल बुना है,
हमने अपनी दुआओं में बस उसी को चुना है।

वह हमारा ही अक्स, हमारा ही वजूद है,
जिसके होने से घर में जन्नत का सुजूद है।

निस्वार्थ प्रेम और त्याग का वो पावन प्रतीक है,
औलाद ही तो इस दुनिया में सबसे अनमोल और सटीक है।

श्रेष्ठ जिंदगी का एक मुकम्मल अहसास है,
शब्दों और सीमाओं से परे जिसका स्वरूप बेहद विशाल है।

औलाद ही तो इस जीवन का एक मुकम्मल अहसास है,
औलाद ही तो इस जीवन का एक मुकम्मल अहसास है।

स्वाति साहू

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