अधूरी कहानियां- भाग 3

अधूरी कहानियां- भाग 3

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sagar gupta

6 Jan 202515 min read

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पार्टी हॉल में अंशिका को देख सब उसे उसके जन्मदिन की बधाइयां देने लगे। मेरी नज़र अब भी साक्षी को ढूंढ रही थी। पर वो कहीं नहीं दिख रही थी।

मेरे हावभाव को देख अंशिका ने मेरे कान में धीरे से कहा, "क्या हुआ? तेरी वाली अब भी नहीं आयी? फिक्र मत कर, आ ही रही होंगी। सब्र कर बेटा, सब्र का फल मीठा होता है।" 

"तुमने उसे इनवाईट  तो किया था न?"

"हाँ यार, आ ही रही होगी। जस्ट चिल्ल."

"केक काटों अब अंशु।" अंशिका के पापा ने उससे कहा।

"बस 5 मिनिट पापा। मेरी एक फ्रेंड नहीं आयी है अब तक।" अंशिका ने दरवाजे की तरफ देखते हुए कहा।

"वो आ जायेगी। तब तक तुम केक काटो, बेटा। मेहमान प्रतीक्षा कर रहे है।" अंशिका की मां ने उसे कहा।

"जी माँ।" अंशिका ने मेरी तरफ उदासी भरी नजरों से देखते हुए कहा।

अंशिका केक काटने ही वाली थी कि दरवाजे से किसी के जोर से आवाज़ आई," रुको।"

सब दरवाजे की ओर देखने को पलटे। लेकिन मैंने दरवाजे की ओर पलटने का साहस नहीं किया और नीचे देखने लगा क्योंकि उसकी आवाज़ सुनकर मेरे दिल की धड़कन राजधानी ट्रैन से भी अधिक तेज़ गति से धड़कने लगी थी। माथे में पसीना आने लगा था। अपने संवेदना को नियंत्रित करने का मैं असफल प्रयास कर रहा था।

अंशिका का चेहरा खिल गया।

"साक्षी, यार कितना लेट कर दी। कब से वेट  कर रही थी तेरा। अब दरवाजे में मत रहो औऱ इधर आओ।" अंशिका ने चहकते हुए कहा।

मुझे अब भी हिम्मत नहीं हो रही थी कि मैं मुड़ कर उसे देखूं। तभी मानो एक ठंडी हवा का  झौंका मेरे बगल से गुजरा और मेरे पूरे शरीर को कम्पित कर गया।

साक्षी ने अंशिका को जोर से गले लगा लिया।

अब वो  अंशिका के बगल में खड़ी थी। मैंने हिम्मत करके अपनी नजरें उठाई और मैं पूरी तरह से अवाक रह गया।

मेरा मुँह खुला के खुला रह गया। साक्षी का चेहरा सूर्य की भांति दमक रहा था, जिसमें चाँद की शीतलता भी विद्यमान थी। सूर्य और चाँद का ऐसा संगम मैंने आज तक नहीं देखा था। श्रृंगार के नाम पर उसने काजल की एक मोटी और आकर्षक परत आँख के नीचे लगाई हुई थी। साक्षी किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी। उसने नीले और क्रीम रंग के समायोजन वाली एक प्रिंटेड साड़ी पहनी हुई थी। साड़ी का पल्लू नेट का बना हुआ था,जिससे चमकदार गोल्डन रंग की ब्लाउज़  दिख रही थी। उसने गोल्डेन रंग की सैंडल और दाएँ हाथ  में  राजस्थानी डिज़ाइन का कड़ा पहना हुआ था।  साड़ी में उसके शारीरिक बनावट का अंदाज़ा लगाना आसान हो गया था। उसकी नाभि में जब मेरी नज़र गयी तो पूरा शरीर कौंध उठा। उसकी नाभि छोटी और अधिक गहरी थी। मैं उस गहराई में उतर ही रहा था कि हैप्पी बर्थडे अंशिका की जोर आवाज़ ने मुझे इस गहराई से बाहर  निकाल दिया। अंशिका ने बर्थडे का कैंडल अब तक फूक मार कर बुझा दिया था। मैं भी अपने होसो-हवास में आकर हैप्पी बर्थडे का अलाप सबके साथ गुनगुनाने लगा।

अंशिका ने केक काट लिया था और सारे मेहमान अपने-अपने सीट में बैठ चुके थे।

फिर अंशिका ने साउंड सिस्टम वाले भैया के टेबल से माइक ले ली।

"May I have your attention please. आपलोग मेरे जन्मदिन में आए, इसके लिए आपसबों का बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं अपने सारे दोस्तों का भी धन्यवाद करना चाहूंगी, जिन्होंने मेरे जन्मदिन में आकर मेरी खुशी में शामिल हुए है। अब चुकी मैं बर्थडे गर्ल हूँ तो आज मेरा हुक्म ,मेरे दोस्तों को मानना होगा। मानोगे या नहीं?"
सब दोस्तों ने जोर से आवाज़ दी, "हाँ"

"वैरी गुड! दोस्तों, तुमलोगों के लिए एक सरप्राइज है। मैंने एक गेम प्लान कर रखा हैं। तुम सबको ये गेम  खेलना होगा। खेलोगो या नहीं?" उसने इस तरह माइक, हमारी तरफ करके कहा जैसे किसी कन्सर्ट में गायक, अपनी माइक श्रोताओं की ओर कर देते है।

"हाँ" सबने एक-साथ हाथ उठा कर उत्तर दिया। सबको मजा आने लगा था।

"चलो। गेम के रूल मैं समझा देती हूँ। उस टेबल में दो जार हैं, दोनों जारों में 1 से 10 नंबर वाले चीट हैं। 10 लोग एक जार के सामने खड़े हो जाये और 10 लोग दूसरे जार के पास। सभी को एक चिट, जार से उठानी है। एक जार के सामने खड़े लोग, केवल उसी जार से एक चिट उठाएंगे। अब मान लो कि एक जार से किसी ने 5 नंबर लिखी चिट उठाई तो दूसरे जार से जो 5 नंबर की चिट उठाएगा , वो दोनों इस गेम में पार्टनर होंगे। उनदोनों को उस दूसरे टेबल में रखी हथकड़ी(Hand cuffs) लगाई जाएगी। हथकड़ी का एक सिरा, एक पार्टनर के दाएं हाथ में लगाया जाएगा और हथकड़ी का दूसरा सिरा, दूसरे पार्टनर के बाएं हाथ में लगाया जाएगा, ताकि वो दोनों एक-दूसरे से अलग न हो सके। पहले ये कर लो सब। उसके बाद आगे का रूल बताती हूँ। सबको समझ आया न?" अंशिका ने गेम के पहले भाग की रूपरेखा बताते हुए कहा।

"हाँ" सारे दोस्तों ने एक साथ इस बार भी उत्तर दिया।

"बढ़िया। अब चलो सब 10-10 लोगों का ग्रुप एक-एक जार के पास खड़े हो जाओ।"

मैं किसी जार के पास खड़ा नहीं हुआ। मैं इंतेज़ार कर रहा था कि साक्षी जिस जार के पास खड़ी होगी, उसके दूसरे जार के पास मैं जाकर खड़ा होऊंगा ताकि मुझे साक्षी के साथ पार्टनर बनने का मौका मिल सके।

मैंने आजतक पूरे जीवन में कोई लॉटरी तक नहीं जीता था। जब बचपन के दिनों में पेप्सी के ढक्कन के नीचे के कोड को मैसेज करके प्राइज जितने वाली प्रचार आती थी,"मेरा नंबर कब आएगा?"

उसमें कितने पैसे मैसेज करके बर्बाद करने के बाद भी एक बार भी किस्मत नहीं खुली। इसलिए आज साक्षी का पार्टनर बनने का मौका भी मुझे जाता हुआ दिख रहा था। फिर भी मैंने भगवान को इस गेम में साक्षी का पार्टनर बनाने के लिए 1 किलो लड्डू चढ़ाने की रिश्वत देने का वायदा किया और साक्षी जिस जार के पास खड़ी थी, वहां न खड़ा होकर मैं दूसरे जार के पास खड़ा हो गया।

अचानक मेरी नज़र अंशिका से जा मिली और उसने धीरे से आंख मारते हुए कहा,"ऑल द बेस्ट"।

सारे दोस्त जार से चिट उठाकर अपना-अपना पार्टनर खोजने लगे। साक्षी ने भी चिट उठा लिया था और उसके चिट में 4 लिखा हुआ था। सब सारे लोगों ने अपना चिट उठा लिया तो मैंने भी अंत में जार में हाथ डालकर चिट उठा लिया और जैसे ही अनमने ढंग से चिट खोला तो मेरे खुशी का ठिकाना न रहा। उसमें "4" लिखा हुआ था। पहली बार भगवान ने मेरी सुन ली थी। मैं उछल पड़ा। साक्षी अपने हाथ में चिट लिए इधर-उधर अपनी काली-काली बड़ी-बड़ी आँखों से देखकर "4...4..." चिल्ला रही थी। मैं उसकी तरफ धीरे-धीरे बढ़ने लगा। हृदय की गति फिर से काफी तेज हो गई थी। मैं उसके सामने खड़ा था।

"तुम्हारा 4 हैं?" उसने मुझसे कहा।

लेकिन मैं इतना डरा हुआ था कि मुँह से कुछ शब्द निकल ही नहीं रहे थे।

"ओए, हेलो! तुम्हारा 4 है क्या चिट में?" उसने मेरे चेहरे के सामने अपने हाथ फिराते हुए कहा।

"जी, चा ... चार नंबर है।" मैंने हकलाते हुए कहा।

"ओ तुम हकलाते हो, इसलिए देरी से बोले। मुझे नहीं पता था । आई एम सो सॉरी"  उसने दया दिखाने वाले अंदाज में कहा।

"अरे नहीं, हकलाता नहीं हूं। वो तो बस..."

“अच्छा, मतलब सुंदर लड़की देखी नहीं, हकलाना शुरू?”

“नहीं नहीं, ऐसा नहीं है...”

"मजाक कर रही हूँ, मैं साक्षी और तुम?" उसने अपना हाथ मेरी और बढ़ाते हुए कहा।

"हाय! मैं शौर्य। मैं जानता हूँ तुम्हें। तुम मेरे ही स्कूल में तो हो।" मैंने अपने दिल को ‘आल इज़ वेल... आल इज़ वेल’ समझाते हुए उससे हाथ मिलाते हुए कहा।

"पर तुम्हें कभी देखी नहीं। खैर! अब तो हमारी दोस्ती हो गई, स्कूल में मिलना होता रहेगा।" उसने एक हल्की-सी मुस्कान देते हुए कहा।

"क्या अब हमदोनो सच में दोस्त हैं? " मैंने अपने बत्तीसों के बत्तीस दाँत दिखाते हुए उससे पूछा।

"हाँ.. कोई प्रॉब्लम हैं क्या?" उसने संदेहास्पद भरी नजरों से पूछा।

"नहीं , कुछ नहीं। मैं तो बस..."

तभी अंशिका की आवाज़ पूरे हाल में गूंज उठी, "तो दोस्तों, आपलोगों को अपना-अपना पार्टनर मिल गया हैं। जैसा कि मैं देख पा रही हूँ कि मेरा बेस्ट फ्रेंड शौर्य और मेरी बेस्ट फ्रेंड साक्षी एक-दूसरे के पार्टनर बने हैं। बहुत खूब दोस्तों।"

हॉल में बैठे सारे लोगों की नज़र मेरे और साक्षी की तरफ गई और मैंने शर्माते हुए अपनी नज़र नीचे कर ली। मुझे ऐसा लग रहा था कि मानो हमदोनों सच में कपल बन गए हो।

" तो अब आगे ये करना है, आपलोग उस टेबल पर रखे हथकड़ी को अपने और अपने पार्टनर को पहना देंगे और उसकी चाभी उसी टेबल पर छोड़ देंगे। जब तक ये खेल खत्म नहीं होता हैं, तब तक आप, अपने पार्टनर के साथ ही हथकड़ी में बंधे रहेंगे। अब मैं खेल समझा देती हूँ। एक गाना का मुखड़ा बजाया जाएगा,जिसमें किसी आईटम का नाम,उस गाने में आएगा। रुको, रुको! आईटम का मतलब आप जो समझ रहे हो, वो नहीं है। आईटम मतलब कोई सामान या वस्तु का नाम उस गाने में आएगा।“

उसकी आईटम वाली बात को सुन कर सब हँसने लगे।

“एक से अधिक सामानों के नाम ,गाने में आ सकते है। आपको बस गाने में आए आईटम में से किसी एक आईटम को खोजना हैं और उसे उस बड़े बाल्टी में डाल देना है। वो आईटम  घर में ही कहीं होगा। जो पहले उस बाल्टी में आईटम  डालेगा, उसे 5 पॉइंट्स मिलेंगे और फिर अंत में जिसके पॉइंट्स सबसे अधिक होंगे, वो इस गेम का विजेता होगा और उसे एक सरप्राइज गिफ्ट भी मिलेगा। सबको क्लियर हुआ??"

" हाँ" सबने एक साथ रोमांचित होते हुए जवाब दिया।

"तो पहला गाना शुरू करते हैं। सबलोग तैयार हो जाओ। DJ वाले बाबू बजाओ पहला गाना।"

Dj वाले बाबू ने पहला गाना बजाया।

"जब तक रहेगा समोसा में आलू, तेरा रहूंगा ओ मेरी शालू...

जब तक रहेगा समोसे में आलू, चिपकी रहेगी तुझसे ये शालू..."

सारे लोग गाने में आये आईटम  को खोजने भागे। साक्षी ने भी हथकड़ी खींच मुझ पर चिल्लाया," चलो अब। मुझे हारना पसंद नहीं।"

"लेकिन समोसे तो घर में बने नहीं हैं। हाँ, अगर किसी ने बाहर से चोरी-चुपके मंगवाया होगा तो अलग बात है।" मैंने सोचते हुए कहा।

"अरे यार!.. आलू भी तो गाने में आया। किचन में आलू तो होंगे ही। चलो किचेन अब।"

"ओ हाँ, सही कह रही तुम।"

जब तक हम दोनों किचेन आलू लेने पहुंचे, तब तक किसी और ने आलू किचेन से उस बाल्टी में डाल दिया था।

अंशिका की आवाज़ फिर सुनाई दी," Time's up guys.. हमें पहले गाने का विजेता मिल गया है। सोहन और उसका भाई रोहन। इन्हें मिलते हैं 5 पॉइंट्स। अब चलते है, दूसरे गाने पर। तैयार रहिए सब।"

"सब तुम्हारी गलती हैं। थोड़ा जल्दी नहीं भाग सकते थे तुम।" साक्षी ने गुस्साते हुए दूसरी तरफ़ देखते हुए कहा।

मैं अपनी किस्मत पर पछता रहा था। अंशु ठीक कहती थी कि मैं फट्टू ही हूँ। सोचा था कि अपना इम्प्रैशन जमा लूंगा साक्षी के सामने। पहला इम्प्रैशन ही गलत जा रहा था। पर मैं खुश था कि साक्षी थी तो साथ में मेरे।

"Dj वाले बाबू, अगला गाना बजाया जाए।"

DJ वाले बाबू ने अगला गाना ‘शौकीन’ मूवी का "मनाली ट्रेन्स"बजाया।

"रानी, रान-रानी मेरे साथ माल फ़ूँक ले

थामूँ तेरी कमर, धुएँ के फ़िर घूँट ले

साँसों से चढ़ेगी, तू कश तो लगा ले

अरी, दम बोले दम का अब मज़ा लूट ले

चंदन ये बदन, मत कर तू जतन

हमदम, मेरे संग, डोरी मैं तू पतंग..."

 सब गाने की बोल सुन पूरे घर भागने लगे।

"चलो जल्दी से छत।" साक्षी ने मुझे खींचते हुए कहा।

"अरे, छत में क्या मिलेगा? अच्छा, अब समझा, पतंग खोजने के लिए छत चलने बोल रही हो तुम। वेरी क्लेवर यु आर।" मैंने उसे इंप्रेस करने का एक असफल प्रयाश फिर किया।

उसने अजीब-सी मुँह बना कर मुझे देखा और फिर हमदोनों छत की ओर भागे। छत पहुंचते ही साक्षी ने मुझसे कहा, "चल, माल बना।"

"समझा नहीं। क्या माल साक्षी?”

"माल और क्या? बनाओ भी अब।" उसने मुँह बिचकाते हुए कहा।

 मैं उसकी बात समझ नहीं पा रहा था।

उसने फिर मेरी ओर देखा," माल नहीं जानते क्या? कभी पी नहीं है क्या तुमने?"

"माल पीया जाता। आखिर ये होता क्या है साक्षी?"

"हेह। भाई साहब, तुमने माल नहीं पिया क्या कभी? फिर जिंदा रह कर क्या कर रहे हो तुम?"

"नहीं, तुम्हारी बात नहीं समझा मैं साक्षी।"

"अरे यार, माल.. गांजा.. अफ़ीम... अब समझे।"

"यु मीन वीड। नहीं! पागल हो क्या? अभी मैं बच्चा हूँ। ये सब नहीं कर सकता।"

" क्या? बच्चे हो? बाप बनने की उम्र हो जाएगी 3-4 साल में और अभी तुम बच्चे हो।" साक्षी जोर-जोर से हँसने लगीं।

इस बात में मैंने कुछ नहीं कहा।

"पियोगे?" उसने फिर मुझसे कहा।

"नहीं, मुझे नहीं पीना। तुम माल पीती? सच में?" मुझे आश्चर्य हो रहा था।

"गज़ब के फट्टू हो यार तुम। हाँ, मैं पीती हूँ। रुक, तुझे भी आज सिखाती हूँ कि इसे कैसे पिया जाता है।"

साक्षी ने अपने पर्स से एक पतले पारदर्शी रंग की एक कागज निकाली और एक छोटा-सा प्लास्टिक का पाउच निकाला। फिर उसने छत का दरवाजा बाहर से बंद किया और छत पर ही पालथी मार कर बैठ गयी।

"अब समझो तुम। ये जो पेपर देख रहे हो, इसको रोलिंग पेपर कहते है और जो इस छोटे से पाउच में हरे रंग की पत्तियां देख रहे हो, ये गांजा हैं। गांजा एक प्राकृतिक पौधे से बनता है। इसलिए मैं जो पी रही हूँ, वो प्राकृतिक है।“ साक्षी ऐसे पेश आ रही थी कि जैसे वो किसी हर्बल चाय पिने की बात कर रही हो।

“पहले इन पत्तियों को अच्छी तरह से सूखा कर पीसना पड़ता है। फिर इसे इस पेपर में पैक करके जॉइंट तैयार हो जाती। फिर इसके मज़े लो, जितना मज़े लेना हैं।" इतना कहकर उसने पाउच में भरे हरे रंग के पदार्थ को उस पेपर में डाला, उसे पैक किया और पर्स से लाइटर जलाकर उसके बंधे हुए एक छोर में आग लगा दी और फिर उसे बुझा कर उसके धुएं को मुँह से अंदर खिंचने लगी।“

पहली बार मैं किसी लड़की को ऐसे नशे करते देख रहा था। साक्षी के लिए जो मेरी उसकी एक पहचान थी ‘सती सावित्री टाइप’’ उस पर मुझे अब संदेह हो रहा था। कहाँ मेरी साक्षी, स्कूल में खिल- खिला कर हँसने वाली और कहाँ ये साक्षी, जो धुआं-धुआं कर रही है।  

"पी कर देखो तुम। मजा आएगा।" उसने मेरे चेहरे के ऊपर उस हरे रंग की बाबा जी की बूटी का धुँआ छोड़ते हुए बोला।

उसकी गंध इतनी खराब थी कि मैं जोर-जोर से खाँसने लगा।

"छि, मुझे नहीं पीना ये गंदा चीज़। मैं तो ये कहूँगा साक्षी कि तुम भी मत पिया करो ये। अच्छी चीज नहीं है ये।" मैंने अपने मुँह को रुमाल से दबाए साक्षी से कहा।

"शौर्य, तुम तो सच में बच्चे निकले।" वो यह कह कर जोर-जोर से हँसने लगी। ।

उसकी हँसी रुक ही नहीं रही थी, मैं समझ गया कि जॉइंट का असर, उसके दिलों-दिमाग में हावी होने लगा है।

मैं जैसे कुछ कहता, तभी हमें दूर से लाउडस्पीकर से अंशिका की आवाज़ सुनाई दी, "दोस्तों, कहाँ हो सब? किसी ने भी अब तक वो आईटम नहीं खोजा। आप लोग के पास 2 मिनट ही है। जल्दी करे।"

"होली शिट! मैं तो भूल ही गयी थी कि गेम चल रहा है।" साक्षी ने आधे जले जोइंट को जमीन में फेंककर उसे अपने सैंडल से दबाते हुए कहा।

"अब क्या करे? मैं तुम्हारे इस माल,आई मीन,  जोइंट को नहीं डाल सकता उस बाल्टी में। " मैंने साक्षी को एकटक देखते हुए कहा।

"पागल हो क्या? जॉइंट हम डाल भी नहीं सकते। पुलिस उठा कर हमें ले जाएगी। मुझे सोचने दो।" साक्षी अब भी पालथी मार कर बैठी हुई थी।

"एक आईडिया  है। मेरे पास एक सिगरेट भी हैं। इसको ही उस बाल्टी में डाल देते है क्योंकि इसे भी एक तरह से ‘माल’ कहा जा सकता है।" उसने अपने पर्स से सिगरेट की एक पीस निकलते हुए कहा।

"तुम सिगरेट भी पीती।  एकदम चरसी हो क्या?"

"बेटा, मैं क्या-क्या करती, मेरे साथ रहो, सब पता चल जाएगा। अब चलो यहाँ से।" साक्षी ने मुझे खींचते हुए कहा।

हम दोनों उस बाल्टी के पास पहुंच चुके थे। इस गेम के दूसरे कपल भी वहाँ पहुंच चुके थे, पर सबके चेहरे की खामोशी से समझ आ रहा था कि उन्हें गाने में आया एक भी आईटम  नहीं मिला।

साक्षी ने उस सिगरेट को बाल्टी में डालते हुए कहा, "हमने पतंग खोजने की बहुत कोशिश की, पर हमें न डोरी मिली और न पतंग। तब शौर्य ने मुझे आईडिया  दिया कि उसके पास सिगरट हैं, क्यों न उसे ही बाल्टी में डाल दिया जाए क्योंकि वो धुआं भी करती। तो इस तरह हमें इसमें पॉइन्ट मिलना चाहिए।" साक्षी ने अपने पापों का घड़ा मेरे माथे चढ़ा दिया था।

मैं साक्षी को गुस्से से देखे जा रहा था और वहाँ बैठे सारे लोग मुझे आश्चर्य और संसय से देख रहे थे। अंशिका की माँ की नज़र जैसे मेरे से मिली तो वो गुस्से से आग बबूला हो चुकी थी और जैसे ही वो कुछ कहती, अंशिका ने उनका हाथ धीरे से पकड़कर उन्हें शांत कर दिया। मुझे साक्षी से इतना गुस्सा आ रहा था कि एक तो उसने माल फूंका, सिगरेट खुद अपने पर्स ने निकाली और कुसूरवार मुझ जैसे मासूम को बना दिया।

अंशिका असलियत समझ चुकी थी और बात न बिगड़े इसलिए उसने ताली बजाते हुए कहा,

"और इस दूसरे गाने के लिए शौर्य और साक्षी को 5 पॉइंट मिलते है। इनके लिए ज़ोरदार तालियां।"

इस प्रकार लोगों का ध्यान मुझसे हट कर फिर उस गेम की ओर चला गया था।

मेरी अंशिका ऐसी ही है। उसे पता होता है कि कब कैसे किसी स्थिति को अपने वश में करना है। मैं आज भी सोचता हूँ कि वो ये कर कैसी लेती है। मेरे लिए तो ये निर्णय लेना भी मुश्किल हो जाता है कि ये जूते पहनूँ या वो। पर मेरी अंशिका के लिए सब आसान है.........

सागर गुप्ता

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पार्टी हॉल में अंशिका को देख सब उसे उसके जन्मदिन की बधाइयां देने लगे। मेरी नज़र अब भी साक्षी को ढूंढ रही थी। पर वो कहीं नहीं दिख रही थी।

मेरे हावभाव को देख अंशिका ने मेरे कान में धीरे से कहा, "क्या हुआ? तेरी वाली अब भी नहीं आयी? फिक्र मत कर, आ ही रही होंगी। सब्र कर बेटा, सब्र का फल मीठा होता है।" 

"तुमने उसे इनवाईट  तो किया था न?"

"हाँ यार, आ ही रही होगी। जस्ट चिल्ल."

"केक काटों अब अंशु।" अंशिका के पापा ने उससे कहा।

"बस 5 मिनिट पापा। मेरी एक फ्रेंड नहीं आयी है अब तक।" अंशिका ने दरवाजे की तरफ देखते हुए कहा।

"वो आ जायेगी। तब तक तुम केक काटो, बेटा। मेहमान प्रतीक्षा कर रहे है।" अंशिका की मां ने उसे कहा।

"जी माँ।" अंशिका ने मेरी तरफ उदासी भरी नजरों से देखते हुए कहा।

अंशिका केक काटने ही वाली थी कि दरवाजे से किसी के जोर से आवाज़ आई," रुको।"

सब दरवाजे की ओर देखने को पलटे। लेकिन मैंने दरवाजे की ओर पलटने का साहस नहीं किया और नीचे देखने लगा क्योंकि उसकी आवाज़ सुनकर मेरे दिल की धड़कन राजधानी ट्रैन से भी अधिक तेज़ गति से धड़कने लगी थी। माथे में पसीना आने लगा था। अपने संवेदना को नियंत्रित करने का मैं असफल प्रयास कर रहा था।

अंशिका का चेहरा खिल गया।

"साक्षी, यार कितना लेट कर दी। कब से वेट  कर रही थी तेरा। अब दरवाजे में मत रहो औऱ इधर आओ।" अंशिका ने चहकते हुए कहा।

मुझे अब भी हिम्मत नहीं हो रही थी कि मैं मुड़ कर उसे देखूं। तभी मानो एक ठंडी हवा का  झौंका मेरे बगल से गुजरा और मेरे पूरे शरीर को कम्पित कर गया।

साक्षी ने अंशिका को जोर से गले लगा लिया।

अब वो  अंशिका के बगल में खड़ी थी। मैंने हिम्मत करके अपनी नजरें उठाई और मैं पूरी तरह से अवाक रह गया।

मेरा मुँह खुला के खुला रह गया। साक्षी का चेहरा सूर्य की भांति दमक रहा था, जिसमें चाँद की शीतलता भी विद्यमान थी। सूर्य और चाँद का ऐसा संगम मैंने आज तक नहीं देखा था। श्रृंगार के नाम पर उसने काजल की एक मोटी और आकर्षक परत आँख के नीचे लगाई हुई थी। साक्षी किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी। उसने नीले और क्रीम रंग के समायोजन वाली एक प्रिंटेड साड़ी पहनी हुई थी। साड़ी का पल्लू नेट का बना हुआ था,जिससे चमकदार गोल्डन रंग की ब्लाउज़  दिख रही थी। उसने गोल्डेन रंग की सैंडल और दाएँ हाथ  में  राजस्थानी डिज़ाइन का कड़ा पहना हुआ था।  साड़ी में उसके शारीरिक बनावट का अंदाज़ा लगाना आसान हो गया था। उसकी नाभि में जब मेरी नज़र गयी तो पूरा शरीर कौंध उठा। उसकी नाभि छोटी और अधिक गहरी थी। मैं उस गहराई में उतर ही रहा था कि हैप्पी बर्थडे अंशिका की जोर आवाज़ ने मुझे इस गहराई से बाहर  निकाल दिया। अंशिका ने बर्थडे का कैंडल अब तक फूक मार कर बुझा दिया था। मैं भी अपने होसो-हवास में आकर हैप्पी बर्थडे का अलाप सबके साथ गुनगुनाने लगा।

अंशिका ने केक काट लिया था और सारे मेहमान अपने-अपने सीट में बैठ चुके थे।

फिर अंशिका ने साउंड सिस्टम वाले भैया के टेबल से माइक ले ली।

"May I have your attention please. आपलोग मेरे जन्मदिन में आए, इसके लिए आपसबों का बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं अपने सारे दोस्तों का भी धन्यवाद करना चाहूंगी, जिन्होंने मेरे जन्मदिन में आकर मेरी खुशी में शामिल हुए है। अब चुकी मैं बर्थडे गर्ल हूँ तो आज मेरा हुक्म ,मेरे दोस्तों को मानना होगा। मानोगे या नहीं?"
सब दोस्तों ने जोर से आवाज़ दी, "हाँ"

"वैरी गुड! दोस्तों, तुमलोगों के लिए एक सरप्राइज है। मैंने एक गेम प्लान कर रखा हैं। तुम सबको ये गेम  खेलना होगा। खेलोगो या नहीं?" उसने इस तरह माइक, हमारी तरफ करके कहा जैसे किसी कन्सर्ट में गायक, अपनी माइक श्रोताओं की ओर कर देते है।

"हाँ" सबने एक-साथ हाथ उठा कर उत्तर दिया। सबको मजा आने लगा था।

"चलो। गेम के रूल मैं समझा देती हूँ। उस टेबल में दो जार हैं, दोनों जारों में 1 से 10 नंबर वाले चीट हैं। 10 लोग एक जार के सामने खड़े हो जाये और 10 लोग दूसरे जार के पास। सभी को एक चिट, जार से उठानी है। एक जार के सामने खड़े लोग, केवल उसी जार से एक चिट उठाएंगे। अब मान लो कि एक जार से किसी ने 5 नंबर लिखी चिट उठाई तो दूसरे जार से जो 5 नंबर की चिट उठाएगा , वो दोनों इस गेम में पार्टनर होंगे। उनदोनों को उस दूसरे टेबल में रखी हथकड़ी(Hand cuffs) लगाई जाएगी। हथकड़ी का एक सिरा, एक पार्टनर के दाएं हाथ में लगाया जाएगा और हथकड़ी का दूसरा सिरा, दूसरे पार्टनर के बाएं हाथ में लगाया जाएगा, ताकि वो दोनों एक-दूसरे से अलग न हो सके। पहले ये कर लो सब। उसके बाद आगे का रूल बताती हूँ। सबको समझ आया न?" अंशिका ने गेम के पहले भाग की रूपरेखा बताते हुए कहा।

"हाँ" सारे दोस्तों ने एक साथ इस बार भी उत्तर दिया।

"बढ़िया। अब चलो सब 10-10 लोगों का ग्रुप एक-एक जार के पास खड़े हो जाओ।"

मैं किसी जार के पास खड़ा नहीं हुआ। मैं इंतेज़ार कर रहा था कि साक्षी जिस जार के पास खड़ी होगी, उसके दूसरे जार के पास मैं जाकर खड़ा होऊंगा ताकि मुझे साक्षी के साथ पार्टनर बनने का मौका मिल सके।

मैंने आजतक पूरे जीवन में कोई लॉटरी तक नहीं जीता था। जब बचपन के दिनों में पेप्सी के ढक्कन के नीचे के कोड को मैसेज करके प्राइज जितने वाली प्रचार आती थी,"मेरा नंबर कब आएगा?"

उसमें कितने पैसे मैसेज करके बर्बाद करने के बाद भी एक बार भी किस्मत नहीं खुली। इसलिए आज साक्षी का पार्टनर बनने का मौका भी मुझे जाता हुआ दिख रहा था। फिर भी मैंने भगवान को इस गेम में साक्षी का पार्टनर बनाने के लिए 1 किलो लड्डू चढ़ाने की रिश्वत देने का वायदा किया और साक्षी जिस जार के पास खड़ी थी, वहां न खड़ा होकर मैं दूसरे जार के पास खड़ा हो गया।

अचानक मेरी नज़र अंशिका से जा मिली और उसने धीरे से आंख मारते हुए कहा,"ऑल द बेस्ट"।

सारे दोस्त जार से चिट उठाकर अपना-अपना पार्टनर खोजने लगे। साक्षी ने भी चिट उठा लिया था और उसके चिट में 4 लिखा हुआ था। सब सारे लोगों ने अपना चिट उठा लिया तो मैंने भी अंत में जार में हाथ डालकर चिट उठा लिया और जैसे ही अनमने ढंग से चिट खोला तो मेरे खुशी का ठिकाना न रहा। उसमें "4" लिखा हुआ था। पहली बार भगवान ने मेरी सुन ली थी। मैं उछल पड़ा। साक्षी अपने हाथ में चिट लिए इधर-उधर अपनी काली-काली बड़ी-बड़ी आँखों से देखकर "4...4..." चिल्ला रही थी। मैं उसकी तरफ धीरे-धीरे बढ़ने लगा। हृदय की गति फिर से काफी तेज हो गई थी। मैं उसके सामने खड़ा था।

"तुम्हारा 4 हैं?" उसने मुझसे कहा।

लेकिन मैं इतना डरा हुआ था कि मुँह से कुछ शब्द निकल ही नहीं रहे थे।

"ओए, हेलो! तुम्हारा 4 है क्या चिट में?" उसने मेरे चेहरे के सामने अपने हाथ फिराते हुए कहा।

"जी, चा ... चार नंबर है।" मैंने हकलाते हुए कहा।

"ओ तुम हकलाते हो, इसलिए देरी से बोले। मुझे नहीं पता था । आई एम सो सॉरी"  उसने दया दिखाने वाले अंदाज में कहा।

"अरे नहीं, हकलाता नहीं हूं। वो तो बस..."

“अच्छा, मतलब सुंदर लड़की देखी नहीं, हकलाना शुरू?”

“नहीं नहीं, ऐसा नहीं है...”

"मजाक कर रही हूँ, मैं साक्षी और तुम?" उसने अपना हाथ मेरी और बढ़ाते हुए कहा।

"हाय! मैं शौर्य। मैं जानता हूँ तुम्हें। तुम मेरे ही स्कूल में तो हो।" मैंने अपने दिल को ‘आल इज़ वेल... आल इज़ वेल’ समझाते हुए उससे हाथ मिलाते हुए कहा।

"पर तुम्हें कभी देखी नहीं। खैर! अब तो हमारी दोस्ती हो गई, स्कूल में मिलना होता रहेगा।" उसने एक हल्की-सी मुस्कान देते हुए कहा।

"क्या अब हमदोनो सच में दोस्त हैं? " मैंने अपने बत्तीसों के बत्तीस दाँत दिखाते हुए उससे पूछा।

"हाँ.. कोई प्रॉब्लम हैं क्या?" उसने संदेहास्पद भरी नजरों से पूछा।

"नहीं , कुछ नहीं। मैं तो बस..."

तभी अंशिका की आवाज़ पूरे हाल में गूंज उठी, "तो दोस्तों, आपलोगों को अपना-अपना पार्टनर मिल गया हैं। जैसा कि मैं देख पा रही हूँ कि मेरा बेस्ट फ्रेंड शौर्य और मेरी बेस्ट फ्रेंड साक्षी एक-दूसरे के पार्टनर बने हैं। बहुत खूब दोस्तों।"

हॉल में बैठे सारे लोगों की नज़र मेरे और साक्षी की तरफ गई और मैंने शर्माते हुए अपनी नज़र नीचे कर ली। मुझे ऐसा लग रहा था कि मानो हमदोनों सच में कपल बन गए हो।

" तो अब आगे ये करना है, आपलोग उस टेबल पर रखे हथकड़ी को अपने और अपने पार्टनर को पहना देंगे और उसकी चाभी उसी टेबल पर छोड़ देंगे। जब तक ये खेल खत्म नहीं होता हैं, तब तक आप, अपने पार्टनर के साथ ही हथकड़ी में बंधे रहेंगे। अब मैं खेल समझा देती हूँ। एक गाना का मुखड़ा बजाया जाएगा,जिसमें किसी आईटम का नाम,उस गाने में आएगा। रुको, रुको! आईटम का मतलब आप जो समझ रहे हो, वो नहीं है। आईटम मतलब कोई सामान या वस्तु का नाम उस गाने में आएगा।“

उसकी आईटम वाली बात को सुन कर सब हँसने लगे।

“एक से अधिक सामानों के नाम ,गाने में आ सकते है। आपको बस गाने में आए आईटम में से किसी एक आईटम को खोजना हैं और उसे उस बड़े बाल्टी में डाल देना है। वो आईटम  घर में ही कहीं होगा। जो पहले उस बाल्टी में आईटम  डालेगा, उसे 5 पॉइंट्स मिलेंगे और फिर अंत में जिसके पॉइंट्स सबसे अधिक होंगे, वो इस गेम का विजेता होगा और उसे एक सरप्राइज गिफ्ट भी मिलेगा। सबको क्लियर हुआ??"

" हाँ" सबने एक साथ रोमांचित होते हुए जवाब दिया।

"तो पहला गाना शुरू करते हैं। सबलोग तैयार हो जाओ। DJ वाले बाबू बजाओ पहला गाना।"

Dj वाले बाबू ने पहला गाना बजाया।

"जब तक रहेगा समोसा में आलू, तेरा रहूंगा ओ मेरी शालू...

जब तक रहेगा समोसे में आलू, चिपकी रहेगी तुझसे ये शालू..."

सारे लोग गाने में आये आईटम  को खोजने भागे। साक्षी ने भी हथकड़ी खींच मुझ पर चिल्लाया," चलो अब। मुझे हारना पसंद नहीं।"

"लेकिन समोसे तो घर में बने नहीं हैं। हाँ, अगर किसी ने बाहर से चोरी-चुपके मंगवाया होगा तो अलग बात है।" मैंने सोचते हुए कहा।

"अरे यार!.. आलू भी तो गाने में आया। किचन में आलू तो होंगे ही। चलो किचेन अब।"

"ओ हाँ, सही कह रही तुम।"

जब तक हम दोनों किचेन आलू लेने पहुंचे, तब तक किसी और ने आलू किचेन से उस बाल्टी में डाल दिया था।

अंशिका की आवाज़ फिर सुनाई दी," Time's up guys.. हमें पहले गाने का विजेता मिल गया है। सोहन और उसका भाई रोहन। इन्हें मिलते हैं 5 पॉइंट्स। अब चलते है, दूसरे गाने पर। तैयार रहिए सब।"

"सब तुम्हारी गलती हैं। थोड़ा जल्दी नहीं भाग सकते थे तुम।" साक्षी ने गुस्साते हुए दूसरी तरफ़ देखते हुए कहा।

मैं अपनी किस्मत पर पछता रहा था। अंशु ठीक कहती थी कि मैं फट्टू ही हूँ। सोचा था कि अपना इम्प्रैशन जमा लूंगा साक्षी के सामने। पहला इम्प्रैशन ही गलत जा रहा था। पर मैं खुश था कि साक्षी थी तो साथ में मेरे।

"Dj वाले बाबू, अगला गाना बजाया जाए।"

DJ वाले बाबू ने अगला गाना ‘शौकीन’ मूवी का "मनाली ट्रेन्स"बजाया।

"रानी, रान-रानी मेरे साथ माल फ़ूँक ले

थामूँ तेरी कमर, धुएँ के फ़िर घूँट ले

साँसों से चढ़ेगी, तू कश तो लगा ले

अरी, दम बोले दम का अब मज़ा लूट ले

चंदन ये बदन, मत कर तू जतन

हमदम, मेरे संग, डोरी मैं तू पतंग..."

 सब गाने की बोल सुन पूरे घर भागने लगे।

"चलो जल्दी से छत।" साक्षी ने मुझे खींचते हुए कहा।

"अरे, छत में क्या मिलेगा? अच्छा, अब समझा, पतंग खोजने के लिए छत चलने बोल रही हो तुम। वेरी क्लेवर यु आर।" मैंने उसे इंप्रेस करने का एक असफल प्रयाश फिर किया।

उसने अजीब-सी मुँह बना कर मुझे देखा और फिर हमदोनों छत की ओर भागे। छत पहुंचते ही साक्षी ने मुझसे कहा, "चल, माल बना।"

"समझा नहीं। क्या माल साक्षी?”

"माल और क्या? बनाओ भी अब।" उसने मुँह बिचकाते हुए कहा।

 मैं उसकी बात समझ नहीं पा रहा था।

उसने फिर मेरी ओर देखा," माल नहीं जानते क्या? कभी पी नहीं है क्या तुमने?"

"माल पीया जाता। आखिर ये होता क्या है साक्षी?"

"हेह। भाई साहब, तुमने माल नहीं पिया क्या कभी? फिर जिंदा रह कर क्या कर रहे हो तुम?"

"नहीं, तुम्हारी बात नहीं समझा मैं साक्षी।"

"अरे यार, माल.. गांजा.. अफ़ीम... अब समझे।"

"यु मीन वीड। नहीं! पागल हो क्या? अभी मैं बच्चा हूँ। ये सब नहीं कर सकता।"

" क्या? बच्चे हो? बाप बनने की उम्र हो जाएगी 3-4 साल में और अभी तुम बच्चे हो।" साक्षी जोर-जोर से हँसने लगीं।

इस बात में मैंने कुछ नहीं कहा।

"पियोगे?" उसने फिर मुझसे कहा।

"नहीं, मुझे नहीं पीना। तुम माल पीती? सच में?" मुझे आश्चर्य हो रहा था।

"गज़ब के फट्टू हो यार तुम। हाँ, मैं पीती हूँ। रुक, तुझे भी आज सिखाती हूँ कि इसे कैसे पिया जाता है।"

साक्षी ने अपने पर्स से एक पतले पारदर्शी रंग की एक कागज निकाली और एक छोटा-सा प्लास्टिक का पाउच निकाला। फिर उसने छत का दरवाजा बाहर से बंद किया और छत पर ही पालथी मार कर बैठ गयी।

"अब समझो तुम। ये जो पेपर देख रहे हो, इसको रोलिंग पेपर कहते है और जो इस छोटे से पाउच में हरे रंग की पत्तियां देख रहे हो, ये गांजा हैं। गांजा एक प्राकृतिक पौधे से बनता है। इसलिए मैं जो पी रही हूँ, वो प्राकृतिक है।“ साक्षी ऐसे पेश आ रही थी कि जैसे वो किसी हर्बल चाय पिने की बात कर रही हो।

“पहले इन पत्तियों को अच्छी तरह से सूखा कर पीसना पड़ता है। फिर इसे इस पेपर में पैक करके जॉइंट तैयार हो जाती। फिर इसके मज़े लो, जितना मज़े लेना हैं।" इतना कहकर उसने पाउच में भरे हरे रंग के पदार्थ को उस पेपर में डाला, उसे पैक किया और पर्स से लाइटर जलाकर उसके बंधे हुए एक छोर में आग लगा दी और फिर उसे बुझा कर उसके धुएं को मुँह से अंदर खिंचने लगी।“

पहली बार मैं किसी लड़की को ऐसे नशे करते देख रहा था। साक्षी के लिए जो मेरी उसकी एक पहचान थी ‘सती सावित्री टाइप’’ उस पर मुझे अब संदेह हो रहा था। कहाँ मेरी साक्षी, स्कूल में खिल- खिला कर हँसने वाली और कहाँ ये साक्षी, जो धुआं-धुआं कर रही है।  

"पी कर देखो तुम। मजा आएगा।" उसने मेरे चेहरे के ऊपर उस हरे रंग की बाबा जी की बूटी का धुँआ छोड़ते हुए बोला।

उसकी गंध इतनी खराब थी कि मैं जोर-जोर से खाँसने लगा।

"छि, मुझे नहीं पीना ये गंदा चीज़। मैं तो ये कहूँगा साक्षी कि तुम भी मत पिया करो ये। अच्छी चीज नहीं है ये।" मैंने अपने मुँह को रुमाल से दबाए साक्षी से कहा।

"शौर्य, तुम तो सच में बच्चे निकले।" वो यह कह कर जोर-जोर से हँसने लगी। ।

उसकी हँसी रुक ही नहीं रही थी, मैं समझ गया कि जॉइंट का असर, उसके दिलों-दिमाग में हावी होने लगा है।

मैं जैसे कुछ कहता, तभी हमें दूर से लाउडस्पीकर से अंशिका की आवाज़ सुनाई दी, "दोस्तों, कहाँ हो सब? किसी ने भी अब तक वो आईटम नहीं खोजा। आप लोग के पास 2 मिनट ही है। जल्दी करे।"

"होली शिट! मैं तो भूल ही गयी थी कि गेम चल रहा है।" साक्षी ने आधे जले जोइंट को जमीन में फेंककर उसे अपने सैंडल से दबाते हुए कहा।

"अब क्या करे? मैं तुम्हारे इस माल,आई मीन,  जोइंट को नहीं डाल सकता उस बाल्टी में। " मैंने साक्षी को एकटक देखते हुए कहा।

"पागल हो क्या? जॉइंट हम डाल भी नहीं सकते। पुलिस उठा कर हमें ले जाएगी। मुझे सोचने दो।" साक्षी अब भी पालथी मार कर बैठी हुई थी।

"एक आईडिया  है। मेरे पास एक सिगरेट भी हैं। इसको ही उस बाल्टी में डाल देते है क्योंकि इसे भी एक तरह से ‘माल’ कहा जा सकता है।" उसने अपने पर्स से सिगरेट की एक पीस निकलते हुए कहा।

"तुम सिगरेट भी पीती।  एकदम चरसी हो क्या?"

"बेटा, मैं क्या-क्या करती, मेरे साथ रहो, सब पता चल जाएगा। अब चलो यहाँ से।" साक्षी ने मुझे खींचते हुए कहा।

हम दोनों उस बाल्टी के पास पहुंच चुके थे। इस गेम के दूसरे कपल भी वहाँ पहुंच चुके थे, पर सबके चेहरे की खामोशी से समझ आ रहा था कि उन्हें गाने में आया एक भी आईटम  नहीं मिला।

साक्षी ने उस सिगरेट को बाल्टी में डालते हुए कहा, "हमने पतंग खोजने की बहुत कोशिश की, पर हमें न डोरी मिली और न पतंग। तब शौर्य ने मुझे आईडिया  दिया कि उसके पास सिगरट हैं, क्यों न उसे ही बाल्टी में डाल दिया जाए क्योंकि वो धुआं भी करती। तो इस तरह हमें इसमें पॉइन्ट मिलना चाहिए।" साक्षी ने अपने पापों का घड़ा मेरे माथे चढ़ा दिया था।

मैं साक्षी को गुस्से से देखे जा रहा था और वहाँ बैठे सारे लोग मुझे आश्चर्य और संसय से देख रहे थे। अंशिका की माँ की नज़र जैसे मेरे से मिली तो वो गुस्से से आग बबूला हो चुकी थी और जैसे ही वो कुछ कहती, अंशिका ने उनका हाथ धीरे से पकड़कर उन्हें शांत कर दिया। मुझे साक्षी से इतना गुस्सा आ रहा था कि एक तो उसने माल फूंका, सिगरेट खुद अपने पर्स ने निकाली और कुसूरवार मुझ जैसे मासूम को बना दिया।

अंशिका असलियत समझ चुकी थी और बात न बिगड़े इसलिए उसने ताली बजाते हुए कहा,

"और इस दूसरे गाने के लिए शौर्य और साक्षी को 5 पॉइंट मिलते है। इनके लिए ज़ोरदार तालियां।"

इस प्रकार लोगों का ध्यान मुझसे हट कर फिर उस गेम की ओर चला गया था।

मेरी अंशिका ऐसी ही है। उसे पता होता है कि कब कैसे किसी स्थिति को अपने वश में करना है। मैं आज भी सोचता हूँ कि वो ये कर कैसी लेती है। मेरे लिए तो ये निर्णय लेना भी मुश्किल हो जाता है कि ये जूते पहनूँ या वो। पर मेरी अंशिका के लिए सब आसान है.........

सागर गुप्ता

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